प्रथम तीर्थंकर

सबसे पहले जवाब दिया गया: जैन धर्म के पहले तीर्थंकर कौन है?
जैन दर्शन के अनुसार एक काल-चक्र में बारह आरे ( यानि भाग ) होते हैं। ऐसे अनन्तानन्त काल-चक्र बीत चुके हैं और अनन्तानन्त कालचक्र भविष्यकाल में भी होंगे।

एक कालचक्र के मुख्यतया की अपेक्षा से दो विभाग माने जाते हैं – अवसर्पिणी काल और उत्सपिर्णी काल। जिस काल में जीवों की शक्ति , अवगाहना, आयुष्य क्रमश: घटती है , वह अवसर्पिणी काल कहलाता है । और जिस काल में शक्ति , अवगाहना और आयुष्य आदि में क्रमशः वृद्धि होती जाती है , वह उत्सर्पिणी काल कहलाता है। अवसर्पिणी काल के समाप्त होने पर उत्सर्पिणी काल आता है और उत्सर्पिणी काल समाप्त होने पर अवसर्पिणी काल आता है। अनादिकाल से यह क्रम चल रहा है और अनन्तकाल तक यही क्रम चलता रहेगा।

एक उत्सर्पिणी काल दस कोङाकोङी सागरोपम का होता है और एक अवसर्पिणी काल भी दस कोङाकोङी सागरोपम का होता है। अतएव इन दोनों को मिलाकर बीस कोङाकोङी सागरोपम का एक “कालचक्र” होता है। प्रत्येक काल के छह-छह आरे होते हैं। इस तरह एक कालचक्र में कुल बारह आरे होते हैं।

सागरोपम का अर्थ होता है – समय (काल) का वह नाप जिसकी विशालता को तुलनात्मक रूप से दर्शाया जाता है। एक सागरोपम की गणना सामान्य गणित की संख्या से किया जाना संभव नहीं है क्योंकि इसमें असंख्यात या अनन्त वर्ष होते हैं।

अवसर्पिणी काल का प्रत्येक पांचवां और छट्ठा आरा क्रमशः 21000 , 21000 वर्षों का होता है। इसी प्रकार उत्सर्पिणी काल का प्रथम और दूसरा आरा प्रत्येक क्रमशः 21000 , 21000 वर्षों का होता है।

प्रत्येक अवसर्पिणी काल और उत्सर्पिणी काल में इस भरत क्षेत्र में चौबीस-चौबीस तीर्थंकर होते है।

वर्तमान में अवसर्पिणी काल का 21000 वर्षों वाला पांचवां आरा चल रहा है। इस आरे के अभी तक 2500 वर्ष से अधिक बीत चुके हैं। (वर्तमान में वीर निर्वाण संवत 2545 चल रहा है। )

इस अवसर्पिणी काल में प्रथम तीर्थंकर भगवान “ऋषभदेव” , जिनको आदिनाथ भी कहते हैं , हुए थे तथा अन्तिम चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हुए हैं।

इससे स्पष्ट है कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर इस अवसर्पिणी काल की अपेक्षा से “भगवान ऋषभदेव” है। इसके पूर्व भी अनन्त कालचक्रों की अपेक्षा से अनन्त तीर्थंकरों की ऐसी अनन्त चौबीसीयां हो चुकी हैं।

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