शब्द ब्रह्म के शब्द

हयशीर्षा:- भद्राश्ववर्ष में धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य सेवक भगवान वासुदेव की है हयग्रीव संज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्ति  को अत्यंत समाधि निष्ठा के द्वारा हृदय में स्थापित कर इस मंत्र का जाप करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं।

भगवते :-चित्त को विशुद्ध करने वाले ओंकार स्वरूप भगवान धर्म को नमस्कार है।

धर्माय:-

आत्म विशोधनाय

हयशीर्षा का विग्रह मनुष्य और घोड़े का संयुक्त रूप है। प्रलय काल में जब तमः प्रधान दैत्य गण वेदों को चुरा ले गए थे तब ब्रह्मा जी के प्रार्थना करने पर आपने उन्हें रसातल से लाकर दिया। आप अमोघ लीला करने वाले,सत्य संकल्प ,नमस्कृत हैं।

सर्वात्मरूप से आप ही संपूर्ण कार्यों के कारण है और अपने शुद्ध स्वरूप में इस कार्य कारण भाव से सर्वथा अतीत है।आपका अकर्ता और माया के आवरण से रहित है। तो भी जगत की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय यह आपके ही करम माने गए हैं ।सो ठीक ही है इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

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