“पूर्वजन्ममें भरत नामका राजा था। ऐहिक और पारलौकिक दोनों प्रकारके विषयोंसे विरक्त होकर भगवान्की आराधनामें ही लगा रहता था; तो भी एक मृगमें आसक्ति हो जानेसे परमार्थसे भ्रष्ट होकर अगले जन्ममें मृग बनना पड़ा।
किन्तु भगवान् श्रीकृष्णकी आराधनाके प्रभावसे उस मृगयोनिमें भी पूर्वजन्मकी स्मृति लुप्त नहीं हुई।“
सारांश यह है कि –
“विरक्त महापुरुषोंके सत्संगसे प्राप्त ज्ञानरूप खड्गके द्वारा मनुष्यको इस लोकमें ही अपने मोहबन्धनको काट डालना चाहिये।”
फिर श्रीहरिकी लीलाओंके कथन और श्रवणसे वह सुगमतासे ही संसारमार्गको पार करके भगवान्को प्राप्त कर सकता है। ।

